Much प्रसंग, Very व्याख्या of "बकर पुराण"
लोग यात्रा plan करने के पश्चात किताब खरीदते है, मेरा थोड़ा उल्टा रहता है। पहले किताब आई, नही, पहले आई प्रातः स्मरणीय श्री अजीत भारती जी ब्रो को पढ़ने की तीव्र इच्छा फिर किताब और फिर यात्रा। दिल्ली की। ट्रेन का डिब्बा, upper berth, जूते उतारे पंखे पर रखे और पढ़ना शुरू। परंतु दो पृष्ठ पलटते ही ऐसा लगा मानो प्रातः स्मरणीय श्री अजीत भारती जी ब्रो आपके सामने प्रकट हो चुके है और आप बस एकटक उन्हे सुन रहे हो, उनकी johnny depp नुमा भाव भंगिमाओं को निहार रहे हो, उनकी तंज कसने के बाद दी जाने वाली "कैसी रही, दिया न लप्पड़ गजभ" वाली मुस्कान देख रहे हो।
हालांकि मेरी हास्य व्यंग genre कि ये पहली किताब थी तो compare करने को तो ज्यादा कुछ न था। भाषा सहज, सरल और nostalgic feels देने लिए सर्वथा उपयुक्त थी। अश्लीलता, फुहड़ता के बगैर कैसे 17-25 वर्ष की आयु में हुए किस्सों को समझाया जाए और कैसे इसी उम्र वालों को पढ़वाया जाए का code दादा ने crack कर लिया है। Personal favourite section बत्रा सिनेमा रहा क्योंकि वहां के लोहे के दरवाजे पर धक्का, निरंकारी कैंटीन का भटूरा, ढका गांव का चिकन, मुखर्जी नगर की चाय और coronation park में बकर करने का सौभाग्य मुझे भी प्राप्त हुआ है, दूसरे number पर बुद्ध-आनंद संवाद ने बड़ा हंसाया, एक समय तो सामने कि upper berth पर बैठी aunty बोल पड़ी बेटा "Jokes" की किताब पढ़ रहे हो क्या? अरे हां, ट्रेन वाला sequence दोहराने का मन हुआ परंतु इसके बारे में आपसे instagram direct message पर बात होगी, यहां वो भी है जिसके hostel पर हमारी लाल गाड़ी जाती है।
अंतः मैं यही कहूंगा, श्री अजीत भारती जी को पढ़िए, ये अपने आप में एक genre है। ❤️
Comments
Post a Comment